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नारद उवाच - बुध, 05/30/2007 - 08:55
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Ahmad Faraz’ ghazal

नारद उवाच - बुध, 05/30/2007 - 02:53

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नारद उवाच - बुध, 05/30/2007 - 02:09

'कस्तेलरायमोन्दो' कामेरिनो से १० किमी दूर मार्के (Marche) रीजन के माचेराता (Macerata, MC) प्रदेश का एक छोटा सा 'चित्ता' (Citta, शहर) है।

कामेरिनो से बाहर जाने के लिये ट्रेन यहीं से मिलती है, हर आने जाने वाली रेल से जुड़ी है कोन्त्रम की बस सेवा। इसलिये यहाँ के रेलवे स्टेशन का नाम है Castelraimondo-Camerino, स्टेशन के पास ही है इस शहर का चेन्त्रो (Centro) जो कि एक ऊंची मीनार से शोभायमान है, इसको कास्सेरो नाम से जाना जाता है और जो कि १२३७ मे बनाया गया था।

हम, शनिवार को जेन्गा, ग्रोत्ते दि फ़्रासासी और फाब्रियानो से घूमकर वापस लौट रहे थे तो उस समय के प्राकृतिक प्रकाश मे ये कास्सेरो बहुत भव्य लग रहा था।

नीचे की तस्वीर मे इस शहर का एक बड़ा भाग रेलवे लाइन के दूसरी तरफ़ से।

इस तस्वीर मे नज़र आता दूर पहाड़ी पर बसा शहर ही 'कामेरिनो' है। बायीं तरफ़ दिख रहा टावर पहली वाली तस्वीर मे है।

दो अन्य तस्वीरों के लिये मई २००५ मे यहाँ पर रह चुके जार्ज का आभार।

मेरे देश की धरती उगले लुच्चे लुच्ची.डॉ.सुभाष भदौरिया.

नारद उवाच - बुध, 05/30/2007 - 00:35

मेरे देश की धरती उगले लुच्चे लुच्ची

डॉ.सुभाष भदौरिया.

हीरा मोती उगलने वाली मेरे देश की धरती इन दिनों धड़ल्ले से लुच्चे लुच्ची उँगलने में लगी हुई है. इन बेईमानों का चारों तरफ साम्राज्य है.धर्म,राजनीति के ऊँचे सिंहासनों पर ये लोग ही बिराजमान हैं.

हम सांकेतिक रुप से बारी बारी से इनकी काली करतूतों का पर्दाफास करेंगे.

उस दिन टी.वी पर देखा एक अंग्रेजी कुत्ते ने एक तरोताज़ी देशी कुतिया को सरेआम धर दबोचा. फिर कई ऐंगल से मुख प्रदेश तथा उसकी इर्द गिर्द की भूमि पर मिज़ायल की गति से कीस दाग दिये.कुतिया तो मारे खुशी के मस्त हुई जा रही थी पर देशी कुत्तों से भला कैसे बरदास्त होता उन्हें ताव आगया सो लगे भौं भौं करने. हम क्या मर गये थे हमें भी चान्स दो. हमारी अपनी संस्कृति है. ये चूमा-चाटी के कार्यक्रम हम अभी सरेआम नहीं करते चाहे इसमें किसी की मर्जी हो या हमारी जबरदस्ती. फिर अंग्रेजी कुत्ते और देशी कुतिया की ये हिम्मत. सबके सामने बंद कमरे में हम ने कहाँ मना किया था. कई संस्कृति के रक्षक कुत्तों ने अदालत में पीटीशन ठोंक दी.अब अदालत भी इसमें क्या करे. कुत्ता-कुत्ती राज़ी तो क्या करेगा काज़ी.

अभी ये सीन चल ही रहा था कि खबर आयी कुछ सरकारी कुत्तों ने एक हड़काये कुत्ते का एनकाउन्टर कर डाला इस कुत्ता भिड़ंत में कुत्ता तो जन्नतनशी हो गया पर उसकी साथिन को जन्नत मिली या दोज़ख़ इस पर रिसर्च जारी है. कुछ सरकारी कुत्तों को उन पर हाथ फिराने वाले उनके आक़ाओं ने ही खस्सी करवा दिया.सरकारी कुत्ते जेल में पड़े पें पें कर रहे हैं और अपने आक़ाओं की इस मेहरबानी पर इतने गुस्से में है कि अगर मौका मिल जाय तो इन आक़ाओंकी पृष्ठभूमि काट खायें. पर इनके आक़ा भी कम जादूगर नहीं.जरा भी मुँह खोला तो जेल में ही सारी व्यवस्था हो चुकी है. अदालत ने भी कह दिया सरकारी कुत्तों का खस्सी कार्यक्रम जारी रखा जाय आक़ाओं को बाद में देखेंगे.

अभी ये खेल चल ही रहा था कि टी.वी, पर देखा-

पंच नदी के घाट पर भई शेरन की भीड़.

कुत्ते सारे छुप गये कोई न आवे तीर.

हुआ यूँ कि किसी नामी गिरामी कुत्ते ने शेर की खाल पहिनली और अपने को शेर समझने लगा.बस फिर क्या था शेरों के वंशज दहाड़ते हुए निकल पड़े कहाँ छिपे हो कुत्तो बाहर आओ हम तुम्हारा खून पी जायेंगे.शेरों की कमेटी ने ज़ाहिर रूप से तो सभी शेरों को कुत्तों से कोई सम्बन्ध न रखने का फरमान जारी किया पर बंद रूप से कुत्तों से पुराने हिसाब निपटाने को कह दिया. अभी शेरों की सरकार है जो चाहे करो देखते हैं कुत्तों की माँ कब तक खैर मनायेगी.

श्वानराज के साथ साथ कुत्तों का मूत बंद हो गया.सभी फें फें कर रहे हैं. हम ने ऐसा नहीं किया,हम ऐसा कर ही नहीं सकते. पता चला है इस कुत्ता शेर भिड़ंत की योजना बनाने वाले एरकंडीशन्ड कमरे मैं बैठे नज़र रखे हुए हैं-सोचते हैं इक बड़ा कार्यक्रम हो जाये इसके बाद शेरो को आदमखोर बताकर गोली मारी जा सकती है.ये सियार हैं ये भी पता चला है कि शेर की यूनीफोर्म सियारों ने ही सिलवाके भेजी थी जिस पर ये बखेड़ा खड़ा हुआ.श्वानराज ने धारण तो कर लिया पर आफत आ गयी.

शेरों को समझना चाहिए.उनका कुत्तों से क्या मुकाबला. मात्र गर्जना ही काफी है. उन्हें ये भी सोचना चाहिए दुनियाँ शेरों कुत्तों की लड़ाई देखेगी तो क्या समझेगी उन्हें अपनी गरिमा का खयाल रखते हुए शान्त हो जाना चाहिए. शेर भैसों को पछाड़ें, हाथियों को खदेड़ें तब तो बात समझ में आती है उनका कुत्तों से क्या मुकाबला. इसलिए हे वृद्ध, युवां बाल सिहों तुम शान्त हो अपनी मांद में जाओ तुम्हें तुम्हारे सिहंराज का वास्ता तुम गलियों में लड़ोगे तो फिर सीमा पर कौन लड़ेगा तुम्हें अपनी भारत माँ का भी तो सोचना चाहिए.

डॉ.सुभाष भदौरिया

अहमदाबाद. India.

बात की बात

नारद उवाच - मंगल, 05/29/2007 - 23:22
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