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दर्पण मेँ देखती बिम्बोँ का इन्द्रजाल् -सुश्री शिवेश शक्तिदिव्या[ दुर्गाश्री प्रियान्शी]

दर्पण मेँ देखती बिम्बोँ का इन्द्रजाल्
रन्गते होँठ,सजते चेहरोँ के गाल्

अपना असली अक्स खोज रही हूँ
पराछाइयोँ मे बिखरे हेँ भ्रमजाल्

कही घेरती हे पहचानोँ की बोली
रूपम के वैभव मे किरणो के सवाल्

पग पग रखती तौल तौल कर हर पल्

तिमिर से लड़ते दीपक का अथक विश्वास देखा था

कुछ दीप आस्था के थे विश्वास बन गए
कुछ यूं जले कि वो दिए इतिहास बन गए
तुमने भी जलाए थे जो मन में मेरे दिए
वो नेह दीप प्रीत का एहसास बन गए ।

दीपावली पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं !

ग़ज़ल

तिमिर से लड़ते दीपक का अथक विश्वास देखा था

आसु क लेप्

हर शाम पलको तक उजाले आते है
चान्द घिस के चन्दन लगाने आते है

करवत(karvat) बीच नीन्द के फसी रहती है आजकल
ख्वाबो के आजकल कहा सिरहाने आते है

खुश्बु उथार(UTHAR)कि थी हवा मे उचाल(UCHHAL) दी
यादो के दौर मे भी क्या दोहराने आते है

आसु का लेप्

हर शाम पलको तक उजाले आते है
चान्द घिस के चन्दन लगाने आते है

करवत(karvat) बीच नीन्द के फसी रहती है आजकल
ख्वाबो के आजकल कहा सिरहाने आते है

खुश्बु उथार(UTHAR)कि थी हवा मे उचाल(UCHHAL) दी
यादो के दौर मे भी क्या दोहराने आते है

"यह सच है कि ज़िन्दगी आसां नहीं है"

यह सच है कि ज़िन्दगी आसां नहीं है

हार जाना मुश्किलों से मेरी शान नहीं हैं

बाँट रहा आज जो, इंसान को इंसान से

मेरे धर्म मे आता ये गीता-कुरान नही है

चंद लम्हों के लिये बिक जाये जमीर

मेरे दोस्त वो तुम्हारी पहचान नही है

तेरा प्यार हूँ

आज तूने मेरे ख्वाबों में दस्तक दिये,
आज से अपनी साँसों का कर्जदार हूँ।

कल टूटते तारों ने मेरी हसरतों से कहा,
दिल छोटा न कर मैं तेरा ऎतबार हूँ।

तुम्हें यकीन हो न हो मेरे साफगोई का,
मैं इश्क बन तेरे जिगर से आर-पार हूँ।