गीत
मौन व्रत ले के बैठे हों सम्वाद जब,
हमको रह रह के ड़सतीं हैं खामोशियाँ,
शब्द चुप हो गए, अर्थ गुम हो गए,
और शापित हैं आकुल सीं अभिव्यक्तियाँ ।
तुम ये कहते हो कुछ भी हुआ ही नहीं,
चलते चलते मग़र ज़िन्दग़ी थम गई,
जब अहं के ये पर्वत हिमालय हुए,
बोल पथरा गए, बर्फ़ सी जम गई,
पिछले रिश्तों की थोड़ी तपन दे सको,
तो पिघल जाएंगीं मोम की वादियाँ ।
शब्द इतने भी बोझिल नहीं हो गए,
कि अधर उनका बोझा उठा न सकें,
मूक परिचय अग़र रूठ जाएं तो क्या ?
हम मुखर होके उनको मना न सकें,
आवरण में बन्धी ज़िल्द में खो के हम,
पढ़ न पाए जो भीतर थीं बारीकियाँ ।
शब्द की इक नदी बीच में बह रही,
हम किनारे की मानिन्द कटते गए,
थी विरासत में रिश्तों की पूंजी बहुत,
पर बसीयत में लिखे से बंटते गए,
हमने देखा है सूरज को ढ़लते हुए,
कितनी लम्बी सीं लगतीं हैं परछाइयाँ ।
आर सी शर्मा ’आरसी’
"दीपशिखा",विद्या विहार, कोटा-३२४००२ राजस्थान्